बीएड के कारण हाशिए पर डीएलएड

प्राथमिक स्कूलों में शिक्षक बनने का दो वर्षीय प्रशिक्षण पाठ्यक्रम डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजूकेशन यानी डीएलएड को अब अभ्यर्थी नहीं मिल रहे हैं। पहले चरण में जिस तरह से प्रवेश हुआ है उससे अंदेशा है कि इस बार आधे से अधिक सीटें खाली ही रहेंगी। यह नौबत आने की वजह बीएड है, जब से एनसीटीई यानी राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने प्राथमिक स्कूलों में सशर्त बीएड को मान्य किया है, उसके बाद डीएलएड के प्रति आकर्षण घट रहा है।

प्राथमिक स्कूलों में शिक्षक बनने के लिए पहले बीटीसी कोर्स चल रहा था, उसका नाम बदलकर डीएलएड हुआ, पाठ्यक्रम भी बदला गया। यह कोर्स पहले सिर्फ जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों यानी डायट में ही चलता था, जिलों की सभी 67 डायटों में 200-200 सीटें हैं। इसके बाद निजी कालेजों को जिस तरह से मान्यता बांटी गई और वहां पढ़ाई की नियमित निगरानी नहीं हो सकी। इस समय प्रदेश में निजी कालेजों की संख्या 3154 है और डायट व निजी कालेजों में 2019 के लिए कुल सीटों की संख्या 2,299100 है।

बढ़िया पढ़ाई न होने के बाद उसकी परीक्षा राजकीय व सहायताप्राप्त माध्यमिक कालेजों में होने लगी। सिर्फ प्रशिक्षण पाठ्यक्रम का प्रमाणपत्र लेने की हसरत लेने वालों का मोहभंग होना शुरू हुआ, क्योंकि सेमेस्टर परीक्षाओं में बड़ी संख्या में अभ्यर्थी अनुत्तीर्ण हो रहे थे। पिछले वर्ष एनसीटीई ने प्राथमिक स्कूलों में बीएड पाठ्यक्रम को सशर्त मान्य कर दिया। प्रदेश में सिर्फ 2011 की 72825 शिक्षकों की भर्ती में ही बीएड को अर्ह किया गया था। बीएड करने से वह प्राथमिक से लेकर माध्यमिक तक के कालेजों में शिक्षक बनने की दावेदारी कर सकता है, वहीं उतने ही समय में डीएलएड करने वाला अभ्यर्थी सिर्फ प्राथमिक स्तर के लिए अर्ह है। इस बार आवेदन व प्रवेश कम होने का एक बड़ा कारण प्रवेश प्रक्रिया शुरू करने में शासन से देरी से अनुमति मिलना भी है, इसके पहले ही बीएड की लगभग सारी सीटों के लिए प्रवेश हो चुके थे। हालांकि परीक्षा नियामक प्राधिकारी सचिव अनिल भूषण चतुर्वेदी कहते हैं कि डीएलएड में प्रवेश की अंतिम संख्या 31 अगस्त को ही स्पष्ट हो सकेगी, क्योंकि अभी दूसरे चरण का प्रवेश होना है।
बीएड के कारण हाशिए पर डीएलएड

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